श्रीमद्भगवद्गीता: आलोचनाएँ: डा. राज मोहन त्रिवेदी
कर्म बनाम संन्यास का विरोधाभास सामाजिक व्यवस्था का समर्थन युद्ध का औचित्य दार्शनिक जटिलता व्यावहारिक जीवन से दूरी संतुलित दृष्टिकोण कानपुर: जुलाई 18, 2026 श्रीमद्भगवद्गीता: आलोचनाएँ: डा. र…
कर्म बनाम संन्यास का विरोधाभास सामाजिक व्यवस्था का समर्थन युद्ध का औचित्य दार्शनिक जटिलता व्यावहारिक जीवन से दूरी संतुलित दृष्टिकोण कानपुर: जुलाई 18, 2026 श्रीमद्भगवद्गीता: आलोचनाएँ: डा. र…
फल की चिंता किए बिना अपना कर्तव्य करना विवेक और बुद्धि से सत्य और असत्य का भेद समझना दूसरों के मार्ग का अंधानुकरण करने से बेहतर अपने स्वभाव के अनुकूल (स्वधर्म) कार्य करे आधुनिक समय में गीता…
मूल परिचय और संरचना रचयिता: महर्षि वेदव्यास (महाभारत के अंतर्गत)। कुल अध्याय: 18 अध्याय। कुल श्लोक: 700 श्लोक। कानपुर: जुलाई 18, 2026 श्रीमद्भगवद्गीता दर्शन परिचय: डा. राज मोहन त्रिवेदी गी…
सत्य जो सदियों से कवियों और दार्शनिकों द्वारा व्यक्त सांसों का क्या भरोसा पंक्तियाँ हमें जीवन की अनिश्चितता और मृत्यु की अटल सच्चाई के बारे में बताती भावपूर्ण श्रद्धांजलि सादर सस्नेह सांसों…
जन्म 2 फरवरी 1930 को लखनऊ में राज्य स्तरीय शिक्षण प्रशिक्षण प्रवेश परीक्षा मे द्वितीय स्थान राजकीय छात्रवृत्ति प्राप्त पिता श्री राम दत्त अवस्थी राजकीय जुबली कॉलेज, लखनऊ के प्रधानाचार्य …
भक्तियोग की महिमा और परमात्मा के साथ जीव के संबंध को सरल और गहन रूप मेंराजविद्या और राजगुह्य भक्ति का महत्व सर्वव्यापकता साधारण और असाधारण भक्त समर्पण का फल: “पत्रं पुष्पं फलं तोयं” समान दृ…
"मोक्ष संन्यास योग" श्रीमद्भगवद्गीता का अंतिम और सबसे व्यापक अध्याय कर्म करो, पर फल की आसक्ति छोड़ दो। स्वधर्म पालन ही श्रेष्ठ है। भक्ति ही मोक्ष का अंतिम मार्ग है। भगवान की शरण म…